जय जिनेन्द्र

श्रमण संस्कृति के लोक हितकारी सिद्धान्तो एवं उपदेशो के व्यापक रूप से प्रचार - प्रसार तत्सम्बन्धी साहित्य के सृजन, वृद्धि, एवं विस्तार, भारतीय एवं जैन दर्शन संस्कृति तथा प्राचीन भाषाओ पर शोध करवाना, आर्थिक सहयोग करना, ज्ञानदान की विभिन्न योजनाओं को क्रियान्बित करना, समय - समय पर समाजसेवी तथा सार्वजानिक संस्थाओ के सहयोग से श्रमण संस्कृति से सम्बंधित विषयों पर प्रतियोगिता आयोजित करना, करवाना तथा शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करना - करवाना एवं सहायता देना, आदि उद्देश्यों को लेकर कार्तिक शुक्ला ६, वि. संवत १९७१ को श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम की स्थापना की गई l

" जो पिच्छी का पीछा करते, वे श्रावक कहलाते | जब तक पिच्छी का पीछा हैं , मोक्ष नहीं जा पाते ||
जिनने पिच्छी पकड़ी, उनको मोक्ष लक्ष्मी वरती | ऐसे त्यागी संतो का , पिच्छी खुद पीछा करती ||"

प्रतिमा की छाती (वक्ष) पर चार पंखुड़ी का एक फूल-सा बना होता हैं | यह चिन्ह तीर्थंकरो के एक हजार आठ शुभ चिन्हों में से श्रीवत्स नाम का चिन्ह हैं | श्री का अर्थ हैं लक्ष्मी एवं वत्स का अर्थ हैं पुत्र अर्थात जिनको अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख एवं अनन्तवीर्य रूप अंतरंग अनंत चतुष्टय लक्ष्मी प्राप्ती हुई है एवं बहिरंग में भी समवशरण आदि लक्ष्मी से शोभायमान है, 'श्रीवत्स' चिन्ह यानि लक्ष्मीपुत्र, नियम से तीर्थकरों के होता है | अरिहंतों के होने का नियम नहीं हैं |

श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट इंदौर के स्थापनाकर्ता

४ नवम्बर १९२१ कार्तिक शुक्ला ६, वि. संवत १९७१ को श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम की स्थापना की गई l

सर सेठ हुकुम चंद जी

सेठ कस्तूर चंद जी

सेठ कल्याणमल जी

आप मंदिर जी के दर्शन करने आये हैं, देखने आये हैं , आँखे बंद करने नहीं आये हैं | हाँ ! प्रारम्भ में मंदिर जी में वेदियों की प्रत्येक मूर्ति के स्वरूप को ग़ौरसे देखो, न जाने किस मूर्ति का सूर्यमंत्र आपकी चेतना को छू जाये और आपके अंदर सम्यक्त्व का कमल खिल जाये |

जैन पंचांग