आश्रम काम्प्लेक्स

संस्थाध्यक्ष स्व. देवकुमारसिंह जी कासलीवाल ने ट्रस्ट को स्वावलंबी बनाने के उद्देश से काम्प्लेक्स का निर्माण कराया l डॉ. अजितकुमारसिंह कासलीवाल ने अपनी दूरदृष्टि व व्यापक सूझबूझ से इस ट्रस्ट की गतिविधियों के सुचारू रूप से संचालन हेतु स्थायी आय का स्त्रोत विकसित कराया l स्व. श्री देवकुमारसिंह जी कासलीवाल की दूरदृष्टि एवं कल्पनाशीलता तथा डॉ. अजितकुमारसिंह कासलीवाल की कर्मठता एवं जुझारू प्रवत्ति से श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट नियमित आय वाला सक्षम ट्रस्ट बना l ट्रस्ट के निर्विकल्प सतत एवं उदात्त आर्थिक संरक्षण के कारण ही कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ देश - विदेश में अपना स्थान बना सकी है l सम्प्रति ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री अजितकुमारसिंह कासलीवाल एवं ट्रस्ट के ट्रस्टी श्री प्रदीपकुमारसिंह कासलीवाल, श्री प्रवीणकुमारसिंह कासलीवाल, श्री सुशीलकुमार सिंह कासलीवाल, ब्र. श्री अनिल जैन है एवं ट्रस्ट के प्रबंधक श्री अरविन्द कुमार जैन है l

उपरोक्त सभी लोग ट्रस्ट की समस्त गतिबिधियो का सफल संचालन कर रहे है l

" जो पिच्छी का पीछा करते, वे श्रावक कहलाते | जब तक पिच्छी का पीछा हैं , मोक्ष नहीं जा पाते ||
जिनने पिच्छी पकड़ी, उनको मोक्ष लक्ष्मी वरती | ऐसे त्यागी संतो का , पिच्छी खुद पीछा करती ||"

प्रतिमा की छाती (वक्ष) पर चार पंखुड़ी का एक फूल-सा बना होता हैं | यह चिन्ह तीर्थंकरो के एक हजार आठ शुभ चिन्हों में से श्रीवत्स नाम का चिन्ह हैं | श्री का अर्थ हैं लक्ष्मी एवं वत्स का अर्थ हैं पुत्र अर्थात जिनको अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख एवं अनन्तवीर्य रूप अंतरंग अनंत चतुष्टय लक्ष्मी प्राप्ती हुई है एवं बहिरंग में भी समवशरण आदि लक्ष्मी से शोभायमान है, 'श्रीवत्स' चिन्ह यानि लक्ष्मीपुत्र, नियम से तीर्थकरों के होता है | अरिहंतों के होने का नियम नहीं हैं |