कुंद - कुंद ज्ञानपीठ

दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु स्व. श्री देवकुमारसिंह कासलीवाल की पहल पर १९.१०.१९८७ को कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इंदौर की स्थापना की गई एवं मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय श्री मोतीलाल जी वोरा के कर - कमलो से इसका उद्घाटन संम्पन्न हुआ l कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ की स्थापना मूलतः शोध संस्थान के रूप में की गई है l तथपि इसकी गतिविधियों को प्रारम्भ से ही बहुआयामी रखा गया है l हम यहाँ इसकी प्रमुख प्रवृतियों एवं इसकी उपलब्धियों की संछिप्त जानकारी प्रस्तुत कर रहे है l

द्रव्य चढ़ाना हमारे परिणामो को विशुद्ध बनाने में निमित्त हैं तथा जितने द्रव्य को हम प्रभो चरणो में अर्पण करते हैं, उतना हमारा 'लोभ' का त्याग होता हैं |

प्रतिमा की छाती (वक्ष) पर चार पंखुड़ी का एक फूल-सा बना होता हैं | यह चिन्ह तीर्थंकरो के एक हजार आठ शुभ चिन्हों में से श्रीवत्स नाम का चिन्ह हैं | श्री का अर्थ हैं लक्ष्मी एवं वत्स का अर्थ हैं पुत्र अर्थात जिनको अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख एवं अनन्तवीर्य रूप अंतरंग अनंत चतुष्टय लक्ष्मी प्राप्ती हुई है एवं बहिरंग में भी समवशरण आदि लक्ष्मी से शोभायमान है, 'श्रीवत्स' चिन्ह यानि लक्ष्मीपुत्र, नियम से तीर्थकरों के होता है | अरिहंतों के होने का नियम नहीं हैं |