ट्रस्ट परिचय

ट्रस्ट की मीटिंग दिनांक ३ जुलाई ,१९८७ में पारित संशोधनों के आधार पर

ट्रस्ट डीड की प्रतिलिपि

श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ,तुकोगंज ,इंदौर (म.प्र.)

आज यह ट्रस्ट पत्र तारीख माह नवंबर सन १९२१ ई दिगम्बर जैन खण्डेलवाल श्रावक आदि जैन जाति वाले इंदौर छहो पंचयतियो के मुखिया सरपंच रायबहादुर सर सेठ हुकुमचन्दजी स्वरूपचन्दजी व् रे बहादुर सेठ कस्तुरचन्दजी औकारजी व् रायबहादुर सेठ कल्याणमलजी तिलोकचंदजी लिख देने वाले|

यह ट्रस्ट पत्र करने में आता है यधपि इस दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम में हर दिगम्बर जैन समाज के भाइयो का रुपया लगा है और लगेगा परन्तु विशेष करके ज्यादा रुपया हम तीनो भाइयो के ही लगे है इस वास्ते हम तीनो के तफ से यह ट्रस्ट पत्र लिख देते है |

बात यह है की प्राचीन कल में साधु तथा व्रती श्रावक होते थे उनके उपदेश से गृहस्थ श्रावक (जैन) भव्य जीवन सम्यज्ञान की प्राप्ति के साथ साथ चरित्र ग्रहण कर आत्म कल्याण करते थे और पात्र दान करके महान पुण्य करते थे और उन्हें से विद्या प्राप्ति करके धनादिक लौकिक उन्नति भी करते थे परन्तु वर्तमान समय में ऐसे सच्चे विराजे व्रतियों का अभव सा ही हो रहा है|इसका मूख्य कारण हम गृहस्थों के घरो में व्रतियों के योग्य शुद्ध भोजन का आभाव है इसी सबब से यदि किसी सच्चे धर्मात्मा के कदाचित संसार से विरक्तता उत्पन्न हो और वह यह व्रत ग्रहण कर स्वप्र कल्याण करना चाहे तो शुद्ध भोजन की दुर्लभता जानकर उसका वैराग्य ह्रदय के भीतर-के-भीतर ही विलय हो जाता है | यधपि वर्तमान में ज्ञान की उन्नति कुछ विशेष देखि जाती है परन्तु चरित्र शून्य होने से यथार्थ उपकार हम गृहस्थों का होता नही |यधपि उपदेशकादिक भी सभाओं की तरफ से उपदेश करते हुए भ्रमण करते है तो भी चरित्र शून्य होने से उनका हृदय में यथार्थ रूप से प्रवेश नही करता और नाम मात्र के त्यागी भी कुछ भ्रमण करते है ,परन्तु उनके विशेष ज्ञान न होने से यथार्थ उपदेश नही होता| कदाचित कुछ ज्ञान सम्पन्न त्यागी ब्रह्मचारी दोयक है भी परन्तु इतनी बड़ी समाज में इतने से क्या होता है ऐसा देखकर के धर्मात्मा सज्जनो का ऐसा विचार हुआ की एक उदासीन आश्रम खोला जाय उसमे शुद्ध भोजनादिक का प्राबाद रहे तो जिन धर्मात्माओं के वैराग्यभाव उतपन्न ही और वे ग्रह के प्रपंच और पापो से अलग होकर आत्म-कल्याण करना चाहे तो इस आश्रम में रहकर शुद्ध भोजन के निराकुलता से अपने ज्ञान वैराग्य को बढ़ाकर अपना और समाज का (स्वपर) कल्याण कर सके |

निमित्त पाकर सम्वत्१९७१ चैत सुदी ९ को रायबहादुर सेठ कल्याणमलजी के तुकोगंज के श्री जैन मंदिरजी की प्रतिष्ठा हुए उस समय उदासीन आश्रम के चर्चा चलाई गई तो तत्काल ही चंदा रुपया ३१५००/-साढ़े इकतीस हजार के करीब लिखा गया जिसमे १००००/- दस हजार रायबहादुर दानवीर राज्य-भूषण सर सेठ हुकुमचन्दजी १००००/- दस हजार दानवीर रायबहादुर और १००००/- रायबहादुर सेठ कल्याणमलजी और डेढ़ हजार के करीब इंदौर तथा अन्य ग्राम नगरो कर जैन दिगंबर महाशयों ने भी इस प्रकार साढ़े इकतीस के करीबन चंदा लिखकर निश्चय हुआ की इसी तुकोगंज में दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम के नाम से संस्था खोली जाये,अतः इसी मंतव्य के अनुसार कार्तिक सुदी ६ संवत को रायबहादुर सर सेठ हुकुमचन्दजी घंटा घर के कंपाउंड की कोठरियों से इस आश्रम का महूर्त होकर कायम हो गया और संवत १९७३ में करीब १५०००/- पंद्रह हजार की लागत का आश्रम के अर्थ भव्य मकान बन गया, जब से उदासी महाशय सब इसी मकान में रहते है |

जमीन मकान व् नगदी रुपया और उदासीन आश्रम का बर्ताव चिरकाल तक कायम रखने के लिए यह ट्रस्ट पत्र लिखा है उसके शर्ते निचे लिखे मुआफिक है :

(1)जो करीब साढ़े इकतिस हजार का चंदा लिखा गया था, वह वसूल हो गया उसमे जो डेढ़ हजार का चंदा इंदौर व् बहार के जैनियो ने लिखा था उसमे से आधा वसूल हुआ, बाकि नही हुआ तथा रुपये १०००/- एक हजाय स्वर्गीय उदासी श्रीमान अमरचन्दजी अपनी दान की सूचि में लिख गये तथा अन्य आमदनी तथा ब्याज वगेरह में से खर्च होकर बचत रहकर अब इस समय रूपये 34784.15 है |जिसमे रूपये 14784.15 रूपये तो आश्रम के इमारत में लगे है बाकि रुपये बीस हजार ध्रुव फण्ड में है |इनको कायम रखकर इनका ब्याज आवे use उदासीन आश्रम का खर्च चल्या जावे इस मूलधन में से कुछ भी खर्च नही किया जावे,कदाचित खर्च में कमी रहे तो समज से लेकर पूरा किया जाये अथवा आश्रम के वर्तमान भूमि का विकास एवं नव निर्माण कर उससे धनोपार्जन करके आश्रम के उद्देश्या की पूर्ति एवं ट्रस्ट के अन्य उद्देश्यो को भी पूरा किया जावे और जो आमदनी ज्यादा आवे और खर्च कम होव तब जो वह रुपया बढ़े अथवा समाज में कोई ध्रुव फण्ड में रुपया और देवे तो उपरोक्त बीस हजार में बढ़ाकर ध्रुव फण्ड को बढ़ाया जाये किन्तु कमी नही की जाये | हम लोगो ने तथा जैन समाज ने जो इस आश्रम को अर्थद्रव्य प्रदानकीयता है या आगे देवेंगे इसमें हमारा या हमारे वारिस आदि या अन्य जैन समाज का या इसके ट्रस्टियों का कुछ भी हक्क लेने या मूलधन को (ध्रुव फण्ड )को अस्त-व्यस्त करने का कुछ भी अधिकार नही है और जो ब्याज व् अन्य आमदनी आवे उसको उसी आश्रम में ही खर्च किया जावे, दूसरे किसी भी अन्य कार्यो में खर्च न किया जावे कदाचित देवगति से इस उदासीन आश्रम में कोई उदासी श्रावक न रहे तो उसकी कोशिश करके उदासियों को बुलाना चाहिए कदाचित किसी रीती से कोई उदासी श्रावक न आवे तो ५ या ७ बरस तक इस बात की कोशिश रखे , जो ५ -७ वर्ष तक कोशिश करने से भी कोई उदासी भर्ती नही हो सके तो उदासीनाश्रम की जायदाद कुल बेचकर उस पूंजी से तथा नगदी पूंजी भी मिलकर उस पूंजी से इन डोरे में असमर्थ दिगम्बर जानियो के लिए एक भोजनशाला खोलकर ब्याज की आमदनी उसमे व्यय की जाये लकिन मूल पूंजी कायम रखी जावे और कोई दफे उदासीन श्रावक त्यागी आवे तो उसमे से योग्य भोजन का प्रबंध करा दिया जाये और उस भोजन शाला में छ्ना जल बरता जाये और अभक्ष् वस्तु का भोजन नही बनाया जाये |परन्तु इस ध्रुव फण्ड को कायम रखते हुए वर्तमान जमीन के विकास, नव निर्माण, चल-अचल सम्पत्ति को विक्रय कर या उसका किराए पर उठकर उस पर त्रण लेकर व अन्य साधनो से अर्जित धनराशि को ट्रस्ट के अन्य उद्देश्यों पर खर्च किया जावे|

श्रमण संस्कृति के लोकहितकारी सिद्धांतो एवं उपदेशो का दर्शन तथा साहित्य का व्यापक रूप से प्रचर एवं प्रसार तथा तत्संबंधी साहित्य का सृजन प्रकाशन करना तथा करवाना |

श्रमण संस्कृति एवं धर्म पर आधारित मूर्ति,स्तम्भ,शिलालेख, अभिलेख, कीर्ति-स्तम्भ,स्मारक ,पुस्तकालय ,वाचनालय,स्वाध्याय भवन,संग्रहालय, बाल-क्रीड़ा केंद्र तथा दुर्गम अप्रकट तीर्थो ,मंदिरो ,प्रतिमाओ, धर्मायतनो, स्थापत्य कलाकृतियों शास्त्रो का आवश्यकतानुसार सर्वेक्ष्ण,खोज अर्जन,प्रकाशन,वृद्धि ,रक्षा एवं विस्तार करना तथा इन कार्यो से संबंधित संस्थाओ को योगदान देना |

भारतीयों एवं जैन दर्शन,संस्कृति आदि प्राचीन बाषाओ,शरमन संस्कृति समाज,कला स्थापत्य आदि विषयो पर शोध कार्य करना,करवाना तथा ऐसे शोधकर्ताओं को पुरस्कृत करना तथा छात्रवृति एवं आर्थिक सहयोग |वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शिक्षा पा रहे मेधावी छात्र-छत्राओ को उच्च शिक्षा हेतु उपयुक्त सहयोग देना तथा विश्व विद्यालयों में अध्ययनकरने वाले विशेष योग्यता वाले छात्र-छत्राओ के लिए शिक्षा गौद प्रणाली के आधार पर उचित सहयोग प्रदान करना साथ ही विदेशो में उच्च शिक्षा हेतु भिजवाना | इस प्रकार ज्ञानदान की विभिन्न योजनाओ को क्रियान्वित करना |

समय-समय पर स्वयं या विभिन्न शैक्षणिक ,समजसेवा तथा सार्वजनिक संस्थाओ के सहयोग से श्रमण संस्कृति से संबंधित विषयो पर वाद - विवाद,निबंध ,लेख,उपन्यास ,कहानी ,ललितकला , चित्रकला, मूर्तिकला ,सांस्कृतिक प्रतियोगिता आयोजित करना तथा करवाना एवं प्रतियोगियों को पुरस्कृत करना |

शिक्षण संस्थाओ, शोध संस्थाओ की स्थापना करना व् करवाना एवं कार्यरत संस्थाओ को सहायता देना |

अस्पताल ,औषधालय, बाल मंदिर ,स्कूल ,कॉलेज गुरुकुल ,एवं शिक्षण संस्थाओ का निर्माण करना तथा सहयोग देना |विश्व विद्यालयो में जैन चेयर इत्यादि निर्मित करवाना व् सहयोग देना |

सभी धर्मो में सहिष्णुता एवं समंजस्य का वातावरण निर्माण करना तथा उनके लिए अवसर आयोजित करना तथा उद्देश्य पूर्ति हेतु कार्य करने वाली संस्थाओं को योगदान देना |

ट्रस्ट के स्थायी कोष एवं संचित आय से विभिन्न चल अचल सम्पत्ति निर्माण करना तथा खरीदना ,बेचना ,गिरवी रखना ,किराये पर अथवा लायसेंस पटटे पर देना अथवा लेना इस प्रकार से चल अचल सम्पत्ति के बारे में ऐसी कार्यवाही करना ट्रस्ट के उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक हो |

ट्रस्ट के उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति हेतु समान उद्देश्यों वाली समकक्ष संस्थाओ को स्थायी कोष अथवा आय में से एक मुश्त या वार्षिक अनुदान देना |

उपरोक्त उद्देश्यों के अंतर्गत अनुदान उपयुक्त वयक्ति को भी दिया जा सकेगा |

उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति हेतु विभिन्न संस्थाओ को दिए जाने वाले अनुदानों के व्यवस्थित उपयोग की जानकारी से अवगत होने के लिए उनके ट्रिस्ट या संस्था के ट्रस्ट का निरीक्षण,ट्रस्टी या डायरेक्टर आवश्यकता अनुसार मनुनित किया जा सकेगा |

(2) इस उदासीन की जमीन और मकानात की व् हदद हददूदात की तफ्सील निचे लिखे अनुसार है |

(क) यह जमीन तुकोगंज में शहर और पलासिया पूल के आम सड़क पर होल्कर सरकार के राज्य म्यू. पा. की हदद में सड़क की उत्तर की पूर्व से पश्चिम लम्बी फुट २५० और दक्षिण से उत्तर तक चोड़ी फुट ४०० इसका कुल क्षेत्रफल १००००० फुट होता है जिसका सदर दरवाजा पक्के दो पिलपाये गुमंजदरो के बीच में बना हुआ है और दक्षिण मुखी निकास है इस जमीन की हददबंधी निचे लिखे अनुसार है |

(ख)पूर्व की तरफ जो सड़क शहर से पलासिया को जाने वाली उसमे से निकलकर जो सड़क मिलो की तरफ उत्तर की और गए है उस सड़क के यह पश्चिम में है |

(ग)दक्षिण की तरफ आमसड़क जो शहर से पलासिया पल के तरफ गई है उसके पहली तरफ महाराजा सेक्रेटरी साहिब की कोठी |

(घ)पश्चिम की तरफ सेठ विनोदीरामजी बालचन्दजी श्री झालरापाटन वालो की कोठी |

(ड्) उत्तर की तरफ सामने सेठ ठाकुरचन्दजी मुलचंदजी की कोठी की पीछाड़ी |

(च) इस जमीन पर सदर दरवाजे से उत्तर की तरफ उदासीन आश्रम का मकान लम्बा फुट बना है जिसके बीच में एक तो सरस्वती भवन का बड़ा कमरा है जिसमे शास्त्र अलमारियों में विराजमान रहते है और उदासी महाशय शास्त्रो का पठन-पाठन करते है तथा और लोग आते है वे भी पठन श्रवण करते है | इस कमरे के पूर्व पश्चिम दोनों बगल में दोनों तरफ तीन तीन कमरे और है, जिसमे उदासी महाशय रहते है यानि सोते बैठते ध्यान अध्धयन करते है | इस तरह इस मकान में सात कमरे है | इस मकान के पीछे चौक है जिसमे एक कुवा है कुवे के ऊपर एक पत्थर पर शिलालेख है जिसमे लिखा है की इस कुवे का जल हर एक व्यक्ति को छान कर लेना चाहिए बिना छाना कोई न लेवे जिसके शपथ के लिए हिन्दू और मुसलमानो के लिए दो मूर्ति एक तो गाय की और एक सूअर की उस शिलालेख के निचे खुदी हुई है |

(छ) इस चौक के आगे चलकर एक मकान और है जिसमे ६ छह कोठरियों जिनके ऊपर टीन चढ़ी हुई है और आगे पिछाड़ी की दिवाले तो पक्की है और बीच में खापटाके कच्ची दिवाले है जिसमे एक बड़ी कोठरी रसोई की उसके पश्चिम के तरफ क्रम से एक परिंडा बर्तन रखने माजने की | सामान रखने की और अंत की दो कोठरी कर्मचारी आदि रहने की है | इसके पिछाड़ि कुछ दुरी पर उत्तर की तरफ रास्ता के पास एक पाखाना बना है परन्तु इसमें कोई पाखाने नही फिरता सब उदासी बहार-मैदान (जंगल) में जाते है यहा तो सिर्फ इस वास्ते है की कोई उदासी आदि बीमार हो जाये अशक्त हो जाये व् और कोई कारण पड जाये तो पाखाना फिर सके |

(ज) यह कुल मकानात है अथवा फिर कोई नविन बनेगे वे और उपरोक्त जमीन है वह सब उदासियों के बरतने का है इसमें और किसी का हक्क व् अधिकार नही है इस जमीन और मकानात को न कोई बेच सकता न रहन बे कर सकता न यह किसी के लेनदेन में कुरक वगेरह हो सकते है यह तो केवल धर्म साधने वालो के वास्ते ही बरतने की है | किन्तु उदासीनो की कमी होने पर अनुपयोगी जमीन इत्यादि का उपयोग ट्रस्ट में उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जा सकेगा

(3) उदासियों के अर्थ `ध्रुव नियम अर्थात निचे लिखे नियम हमेशा कायम रहे ये नियम कभी बदले न जाए तोड़े न जाये इन नियमो को तोड़ने बदलने का अधिकार हमको या हमारे वारसो आदि का या अधिठाता को या ट्रस्टियों को या और भी किसी को अधिकार नही यधपि आश्रम के अर्थी चाहे कोई लाखो रुपया भी देवे यह भी नही बदल सकता |

(क) इस उदासीन आश्रम में वे ही उदासी रह सकेंगे जो दिगम्बराम्नाय के शास्त्र अनुसार अरहंत देव निर्ग्रन्थ गुरु और इन्ही के प्रारूप शास्त्र और अहिंसा लक्षण धर्म के और तत्वों के श्रध्दानी होय और मिथ्यात्व अन्याय अभक्ष् व् अतिचार रहित सप्तव्यसन और रात्रि ने चार प्रकार के भोजन के त्यागी और अतिचार रहित आठ मूल गुण के धारी शास्त्रोक्त जैन उच्चकुल के व्रती पुरूषों के योग्य परम्पराय अनुसार मर्यादिक शुद्ध क्रिया युक्त भोजन पान के करने वाले गृह कुटुंब के वे अपनी भोजनादि क्रिया के बिना अन्य सर्व सांसारिक कार्यो के त्यागी होय व् त्याग के सन्मुख होय और सदा धर्म ध्यान में रहकर स्वपर कल्याण करते रहे |

(ख) बीस वर्ष के कम उम्र का उदासीन आश्रम में भर्ती नही किया जाये |

(ग) आश्रम में उदासियों को प्रवेश होने के नियम तथा प्रतिज्ञा पत्र लिखाये जावे उसी के अनुसार उदासीन महाशय प्रवतृत रहे वे नियम कारणपाय अधिष्ठाता की मुख्य सम्पत्ति और स्ट्रस्टियो की सम्पत्ति से कदाचित हीनाधिक भी हो सकेंगे किन्तु ऊपर प्रथम (क) नंबर के नियम कदाचित भी हेर फेर हीनाधिक नही हो सकेंगे |

(घ) आश्रम का अधिष्ठाता या उपअधिष्ठाता एक या दो नविन कायम किये जाये सो उदासियों में से ही जो विशेष् गुण वाले होवे उसी को कायम किया जावे जो की उदासियों को धर्म मार्ग में प्रवर्तित रहे और आप भी प्रवरते | शास्त्र विरुद्ध नहीं चलने दे|

(ड) उदासीन बीच भर्ती करना,नहीं करना,रखना,नहीं रखने का निकल देने आदि का सर्व अधिकार अधिष्ठाता ही को रहेगा |

(च) उदासियों के ऊपर अधिष्ठाता के सिवाय ट्रस्टी वगेरह कोई शासन (हुकूमत) नहीं करे सर्व ही पूज्य दृष्टि से सदा देखे और विनय से बरते |

(छ) उदासियों से किसी प्रकार की फीस वगेरह नहीं ली जावे भोजन वस्त्रादि आदि सर्व वास्तु आश्रम की तरफ से दी जावे |

(ज) जो कोई उदासी अपने पास आजीविका वाला होवे तो वह अपना खर्च आश्रम अपनी इच्छा अनुसार दे सकता है अथवा अपना भोजनादिक का प्रबंध करके रहे तो भी रह सकेगा परन्तु नियम नंबर (क) और (ग) उपरोक्त अवश्य पालना पड़ेंगे |

(झ) जब पूर्व का अधिष्ठाता व् उपअधिष्ठाता का स्वर्गवास हो जावे व् आश्रम छोड़कर चले जाये अथवा अनुचित बर्ताव देखा जाये तो ट्रस्टियों को मुनासिब हे की सम्पूर्ण उदासियों की सम्मति से उदासियों में जो श्रेष्ठ गुण वाला होए उसको अधिष्ठाता नियुक्त कर दे परन्तु अनुचित बर्ताव प्रवरति पूर्व अधिष्ठाता की निर्णय कर ली जाये छोटी छोटी मामूली बाते ईष्या द्वेष से शिकायत होने पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाये |

(४) ट्रस्टियों को जो हमने मुकरर किये अर्थात नियत करे उनके नाम निचे लिखे अनुसार है ३ दितवारा मंदिर के पंचायती सरपंच रा.ब. सर सेठ हुकुमचंद | रा.ब. सेठ कल्याणमल जी | रा.ब.सेठ कस्तुरचन्दजी ये तीनो और इन तीनो के वंशज अर्थात पुस्तदर पुस्त जो इनकी संतान में होवेगा वह हमेशा ट्रस्टी कायम रहेंगे तथा इनमे कोई नाबालिक होय - अथवा बीमार वगेरह की अवस्था में जो की सम्मति देने लायक न होय तो इनके कारिंदे मुनीम वगेरह जो होय वह इनके तरफ से ट्रस्टी का काम करे |

1. सेठ बालचंद हीरालालजी

2. सेठ बापुलालजी कवरलालजी

3. छोगालालजी नानकरामजी

1. लख्मीचंदजी कासलीवाल

1. पन्नालाल गोधा अधिष्ठाता उदासीन आश्रम

(५) उपरोक्त शर्ते व् स्थावर जंगम ऊपर बनायीं हुई उनके माफ़िक़ परम्पराए प्रवरति कायम (स्थिर) रखने के वास्ते इसका अधिकार इस ट्रस्ट पत्र के जरिये से सर्व उपरोक्त ट्रस्टियों के अधिकार में किया जाता है की जिससे हमारे वंश में व् अन्य दानियो के वंश में कोई कापुत सपूत कदाचित इस आश्रम की स्थावर जंगम जायदाद अपनी व् अपने पुरखो की दी हुई पर कोई उजर न करे तथा अन्य प्रकार उपयोग न कर सके और ऊपर बताई हुई शर्तो के अनुसार परम्पराय निकंटक उपयोग होते रहे हमने व् अन्य दानियो ने जो उदासीन आश्रम को रकम दी है व् आगामी कोई देवेगा उस पर हमारी व् अन्य दानियो की मलिकी बिलकुल नही है वह रकम उदासीन आश्रम की है और उसके रक्षक और प्रबंध करता ट्रस्टी है ट्रस्टियों को प्रबंध करने का क्या अधिकार है वह आगे लिखते है |

(6) जो ऊपर ट्रस्टी मुकरर किये है वे हमेशा कायम रहे जब कोई ट्रस्टी का इनमे से वियोग या स्वर्गवास हो जाये या और कोई हर्जे वर्ज़े जो कार्य करने लायक न हो तो उनके स्थान पर शेष ट्रस्टी अन्य सब ट्रस्टी सम्मति मिलकर बना ले और अधिष्ठाता के स्थान पर दूसरा अधिष्ठाता मनोनीत करले |

(७) इस संस्था में मुख्यता सर्वकार्य में खण्डेलवाल सरावगी की ही रहेगी |

(८) ट्रस्टियों के अधिकार -

(क) जो उदासीन आश्रम का नकदी रुपया बताया हुआ, वर्तमान में रुपये १९००० हज़ार है तथा और आमदनी में आवे या खर्च के सिवाय बचत रहे अर्थात आश्रम के एक साल के खर्च लायक रखकर जादे रूपये १००० एक हज़ार या हज़ार से जादे बचत रहा करे तो यह एक हज़ार मूलधन (ध्रुवफण्ड) में शामिल कर लिया जाया करे और उस मूलधन का ब्याज उपजा कर व् और आमदनी होवे उससे आश्रम का खर्च चलाया जाये मूलधन में से एक दाम भी खर्च नहीं करना |

(ख) वर्तमान में इनमे से १९००० उन्नीस हज़ार के टाटा कंपनी के शेयर प्री -फ़्रेन्स-सेकंड दर 7.५ साढ़े सात टकाके ब्याज के लिए हुवे है और १००० एक हज़ार स्व. उदासीन महाशय अमरचन्दजी महाशय दे गए वे उन्ही की बड़नगर की दुकान रूपचन्दजी अमरचन्दजी नाम वाली पर दर ११) आठ आने सैकड़ा अर्थात रूपये ६ छह टकाके ब्याज पर जमा है इसके सिवाय चालू फण्ड का रुपया है वह सेठ सरूपचन्दजी हुकुमचन्दजी की दुकान पर ११) आठ आना सैकड़ा के ब्याज से जमा है उसमे से खर्च होता रहता है ब्याज वगेरह की आमदनी जमा होती रहती है |

(ग) अब आयन्दा इस मूल द्रव का ब्याज मुनसिब जाने जिस तरे उपजावे मूल द्रव को अच्छी तरह सुरक्षित रखे |

(घ) आश्रम में खर्च जादे हो और ब्याज की आमदनी थोड़ी हो तो चंदा वगेरह से आमदनी को बढ़ाकर खर्च की पूर्ति करे अथवा उदासी जादे भर्ती नहीं करे |

(ड) आश्रम का खर्च अधिष्ठाता को मर्ज़ी के माफ़िक़ आमदनी के भीतर दिया जाया करे और खर्च व्यवस्था अधिष्ठाता उदासियों से करा सके और आप कर सके कब तो अधिष्ठाता मांगने पर नकद रुपया भेज दिया जाया करे जैसा की वर्तमान में होता है और जो व्यवस्था उदासी महाशय व् अधिष्ठाता ना कर सके तो ट्रस्टी महाशय किसी सज्जन के जरिये से अथवा अपने गुमास्ते कर्मचारी आदि के जरिये से अथवा अपने गुमास्ते कर्मचारी आदि के जरिये से अथवा आश्रम के तरफ से कोई वेतन कर्मचारी रखकर खर्च का अर्थात रकम चीज़ लेन मंगाने का और हिसाब किताब का कायदा लिखने रखने का प्रबंध करे |

(च) उदासियों को व् अधिष्ठाता को किसी प्रकार की तकलीफ न हो उनके धर्म ध्यान में विघ्न नहीं पड़े ऐसा प्रबंध हमेशा बनाये रखे और आश्रम की खबर लेते रहे |

(छ) मकानो की मरम्मत तथा नविन मकान बनाने की जरुरत समझे तो ट्रस्टी महाशय आप स्वयं प्रबंध कर दे अधिष्ठाता अ उदासियों के ऊपर भर न ड़ाले |

(ज) कोई राज्य समन्धी आश्रम का झगड़ा उपस्थित हो जाये तो ट्रस्टी महाशय निपटा दिया करे उदासियों को तकलीफ न होवे |

(झ) ट्रस्टियों की कमेटि साल में दो बार अथवा एक बार अवश्य हुआ करे अथवा कोई प्रबंध में गड़बड़ी देखे व् कोई नवीन प्रबंध कुछ करना समझे तो बीच में भी बैठक करके प्रबंध कर दिया करे कोरम ५ का रखा जाये अर्थात कमेंटी में पांच ट्रस्टी से काम न होने चाहिए |

(ण) ट्रस्टीयो को मूलधन की सुरक्षा का उपाय शक्तिपूर्वक करते रहने चाहिए जिससे मूलधन में किसी प्रकार हानि न पहुंचे कदाचित कोई समय ऐसा आ जाये जो मूलधन में बाधा या हानि आ जाये तो उसकी जोखिमदारी ट्रस्टियों को नहीं होगी किन्तु पब्लिक (जैन समाज) से चंदा करके अथवा और किसी प्रकार सहायता लेकर पूर्ति कर लेवे और जैसे ही बने तैसे संस्था को चलाने का भरसक अधिकार ट्रस्टियों को है |

(ट) ट्रस्टियों को इस उदासीन आश्रम की उन्नति करने का हमेशा लक्ष्य रखना चाहिए किसी प्रकार हानि न होने देवे |

ट्रस्टी जिनका नाम ऊपर इस दस्तावेज़ में बताया गया है उन्होंने ट्रस्टी होना काबूल किया है और कबूलात की सही की है |

(९) उपरोक्त दस्तावेज़ व् तरीके ट्रस्ट हम राय बहादुर राज्य भूषण दानवीर सेठ हुकुमचंद सरूपचन्दजी, राय बहादुर सेठ कस्तुरचन्दजी ओम्कारजी, राय बहादुर सेठ कल्याणमलजी, तिलोकचंदजी आदि हमारे वंश वारिस वकील मुखत्यार तरफ से कबुल करते हुवे यह ट्रस्ट पत्र लिख दिया इस खत में बताये माफ़िक़ जायदाद व् मूलधन व् चालुफण्ड के धन पर हमारा व् अन्य दाताओ का कुछ अधिकार व् मलकाना हक नहीं रहा सब हक्क ऊपर लिखे माफ़िक़ ट्रस्टी महाशय को दिया गया है जो की समय समय पर इस दस्तावेज़ के माफ़िक़ ट्रस्टी होते रहेंगे व् हुए है I

हमारे वंश में अथवा अन्यन्य दानियो के वंश में या रिश्तेदारो में कदाचित किसी ने भी इसके विरुद्ध दावा ,झगड़ा,अटकाव,हरक़त किसी प्रकार करे नहीं अगर इस दस्तावेज़ के विरुद्ध बाधा व् किसी प्रकार का झगड़ा करे तो उनका राज्य में कही भी कुछ भी झगड़ा विरोध चलने पावे नहीं क्यूंकि यह दस्तावेज़ हमने हमारी ख़ुशी और परिणामो की उज्जलताई से द्रव का सदुपयोग होने की ग़रज़ से आनंद पूर्वक की है और ऊपर लिखे ट्रस्टी मुकरर किये है वह हमको हमारे वारिस वंशज वकील मुखत्यार आदि सबको मंजूर और कबूल है |