त्यागी व्रती आश्रम

प्राचीन काल में साधु तथा व्रती श्रावक होते थे l उनके उपदेश से गृहस्थ श्रावक भव्य जीव सम्यक ज्ञान की प्राप्ति के साथ चारित्र ग्रहण कर कल्याण करते थे l उन्हीं से विद्या प्राप्त करके धनादिक लौकिक उन्नति भी करते थे l

शुद्ध भोजनादिक का प्रबंध, धर्मात्माओं में वैराग्य का भाव व् गृह के प्रपंच और पापों से अलग होकर आत्म कल्याण जो करना चाहे वह इस आश्रम में अपने ज्ञान - वैराग्य को बढ़ा कर अपना और समाज का कल्याण कर सकता हैं l

प्रारम्भ से ही यह आश्रम देश का सिरमौर बना हैं और आज इस आश्रम की पुरे देश में विशिष्ट छवि हैं l इस आश्रम में पं. रतनलाल जी शास्त्री के माध्यम से शिक्षा दी जाती हैं l अनेक व्रतियों ने इसी आश्रम में रहकर धर्मराधना, साधना को बढ़ाते हुए समाधी ली हैं l इसी आश्रम में अध्ययन व् त्याग की पहली सीढी को सीख कर अनेक व्रती संघो में दीक्षा ग्रहण कर अपनी आत्म साधना में रत हैं l

धर्म और संस्कृति की नि: स्वार्थ सेवा इन सभी के द्वारा पर्वो व विशेष अवसरों पर की जाती है जिससे देश का समाज लाभान्वित हो रहा है l

भगवान के सामने भोगों के भिखारी बनकर मत आइये | बल्कि भोगों के त्यागी बनकर उच्चकोटि के दाता बनकर जाइये, तभी देव- दर्शन का सही लाभ हो सकता हैं |

प्रतिमा की छाती (वक्ष) पर चार पंखुड़ी का एक फूल-सा बना होता हैं | यह चिन्ह तीर्थंकरो के एक हजार आठ शुभ चिन्हों में से श्रीवत्स नाम का चिन्ह हैं | श्री का अर्थ हैं लक्ष्मी एवं वत्स का अर्थ हैं पुत्र अर्थात जिनको अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख एवं अनन्तवीर्य रूप अंतरंग अनंत चतुष्टय लक्ष्मी प्राप्ती हुई है एवं बहिरंग में भी समवशरण आदि लक्ष्मी से शोभायमान है, 'श्रीवत्स' चिन्ह यानि लक्ष्मीपुत्र, नियम से तीर्थकरों के होता है | अरिहंतों के होने का नियम नहीं हैं |